Amarkant Singh / Wed, Sep 16, 2026 / Post views : 114
*सूर्यकांत सिंह चौहान की कलम से *
भिंड-मुरैना-श्योपुर।चंबल... नाम लेते ही जेहन में कभी बीहड़ आते हैं, कभी बागी, कभी बंदूक और कभी सियासत। लेकिन वक्त बदल चुका है। बीहड़ों की पहचान बदलने की कोशिश हो रही है, सड़कें बन रही हैं, बड़े-बड़े प्रोजेक्टों के ऐलान हो रहे हैं और चंबल के नेता प्रदेश से लेकर दिल्ली तक अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।फिर भी सवाल वहीं खड़ा है—चंबल संभाग आखिर विकास की दौड़ में पीछे क्यों है?यह सवाल सिर्फ सरकार से नहीं है। यह सवाल दशकों की राजनीति, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और स्थानीय नेतृत्व—तीनों से है।
चंबल ने मध्यप्रदेश को कई बड़े राजनीतिक चेहरे दिए। मंत्री मिले, सांसद मिले, विधायक मिले और सत्ता के शीर्ष तक पहुंच रखने वाले नेता भी मिले। लेकिन गांव की चौपाल पर आज भी सवाल रोजगार का है। किसान के खेत में सिंचाई का है। शहर में जल निकासी और सीवर का है। युवाओं के हाथ में काम का है और मरीज के सामने बेहतर इलाज का है।राजनीतिक प्रभाव अगर विकास में नहीं बदला तो आखिर उसका फायदा किसे मिला?
रोजगार के लिए पलायन क्यों?
चंबल के युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल रोजगार का है। औद्योगिक विकास की संभावनाओं के बावजूद स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार के अवसर नहीं बन पाए। जिन परिवारों के बच्चे पढ़-लिखकर तैयार हुए, उनमें बड़ी संख्या नौकरी और बेहतर अवसरों की तलाश में ग्वालियर, इंदौर, भोपाल, दिल्ली और दूसरे राज्यों का रुख करती है।सवाल यह है कि जिस इलाके के पास जमीन है, संसाधन हैं और मेहनती युवा हैं, वहां रोजगार का मजबूत स्थानीय मॉडल क्यों नहीं खड़ा हो पाया?
मालनपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों की मौजूदगी उम्मीद जगाती है, लेकिन सवाल यह भी है कि आसपास के गांवों और स्थानीय युवाओं को इसका कितना स्थायी लाभ मिला?
सड़क बनी तो मंजिल कब आएगी?
चंबल में सड़क और कनेक्टिविटी के कई बड़े प्रोजेक्ट वर्षों से चर्चा में हैं। कहीं टेंडर की प्रक्रिया लंबी होती है, कहीं निर्माण की रफ्तार सवालों में रहती है और कहीं सड़क बनने के बाद रखरखाव चुनौती बन जाता है।
सड़क सिर्फ डामर की पट्टी नहीं होती। सड़क बाजार से किसान को, कॉलेज से छात्र को और अस्पताल से मरीज को जोड़ती है।
फिर चंबल की कनेक्टिविटी को विकास की पहली सीढ़ी मानकर उस पर लगातार और तेज काम क्यों नहीं हुआ?
अस्पताल हैं, विशेषज्ञ कहां हैं?
जिला अस्पतालों और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर भी यही तस्वीर सामने आती है। भवन हैं, मशीनें हैं, योजनाएं हैं, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी की शिकायतें लगातार उठती रही हैं।
मरीज को इलाज के लिए दूसरे शहर जाना पड़े तो सवाल सिर्फ अस्पताल का नहीं, पूरे स्वास्थ्य तंत्र का है।
अगर जिला मुख्यालय पर ही गंभीर मरीज को बेहतर इलाज नहीं मिलता, तो विकास की तस्वीर अधूरी क्यों न मानी जाए?
पानी, नाली और सीवर—शहर की पुरानी कहानी
चंबल के शहरों में विकास का एक और विरोधाभास सामने आता है। एक तरफ बड़े प्रोजेक्टों की बात होती है, दूसरी तरफ बारिश आते ही सड़कें जलभराव से जूझती हैं। नालियां, सीवर और जल निकासी जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं आज भी कई जगह चुनौती बनी हुई हैं।
गांवों में सड़क और नाली की मांग है तो शहरों में सीवर और ड्रेनेज की।
यानी सवाल बड़ा नहीं है—सवाल बुनियादी है।
रेत और संसाधन—आमदनी किसकी, विकास कितना?
चंबल की सबसे बड़ी आर्थिक बहसों में रेत भी शामिल है। नदी और खनिज संसाधन क्षेत्र की अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं, लेकिन अवैध उत्खनन और परिवहन को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
सवाल यह है कि प्राकृतिक संसाधनों से सरकार को राजस्व मिलता है तो उसका बड़ा हिस्सा स्थानीय विकास में दिखाई क्यों नहीं देता?
क्या चंबल के संसाधनों से चंबल के गांवों और शहरों की तस्वीर बदलने की कोई दीर्घकालिक योजना है?
सबसे बड़ा सवाल नेतृत्व का
चंबल के पिछड़ेपन का कारण सिर्फ सरकार को बताना आसान जवाब होगा। असली तस्वीर इससे बड़ी है।
यह सवाल राज्य सरकार की प्राथमिकताओं का भी है, स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली का भी और चंबल के राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही का भी।
हर चुनाव में विकास मुद्दा बनता है। सड़क, पानी, रोजगार, अस्पताल और उद्योग के वादे होते हैं। चुनाव के बाद वही सवाल फिर पांच साल की प्रतीक्षा में चला जाता है।
अब चंबल को सिर्फ राजनीतिक भाषण नहीं चाहिए।
उसे चाहिए—रोजगार का रोडमैप, स्वास्थ्य का मजबूत नेटवर्क, कृषि आधारित उद्योग, बेहतर सड़कें, व्यवस्थित शहर और बुनियादी सुविधाओं की जवाबदेही।
क्योंकि चंबल अब बीहड़ों की कहानी से बाहर निकलना चाहता है।उसका सवाल साफ है—जब हमारे नेता सत्ता के केंद्र तक पहुंच सकते हैं, तो विकास की रफ्तार चंबल की चौखट तक क्यों नहीं पहुंच सकती?
आखिरी सवाल
चंबल पिछड़ा इसलिए है कि उसके पास संसाधन कम हैं... या इसलिए कि उन संसाधनों और राजनीतिक प्रभाव को विकास में बदलने की इच्छाशक्ति अब तक कमजोर रही है?इस सवाल का जवाब अब भाषणों से नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले विकास से देना होगा।...
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