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संपादक :-सूर्यकांत सिंह चौहानकी कलम से*
भिण्ड। ........ **
लाठी से कलम को खामोश नहीं किया
जाता ,
सच को मारकर झूठ को जिंदा नहीं किया जाता ,
पत्रकार पर उठी हर चोट सवाल बन जाती है,
*_""कलम दबती नहीं और भी बवाल बन जाती है"".....**_*
सच की राह कभी आसान नहीं होती। उसे कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, उसकी आवाज को रोकने का प्रयास किया जा सकता है, लेकिन सच और न्याय की उम्मीद को हमेशा के लिए खत्म नहीं किया जा सकता। भिण्ड के पत्रकार अमरकांत चौहान और शशिकांत गोयल की करीब 17 माह से जारी कानूनी लड़ाई अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार और तत्कालीन एसपी असित यादव, पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी कर छह सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। इस घटनाक्रम के बाद पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है।
जिस संघर्ष की शुरुआत भिण्ड के तत्कालीन एसपी कार्यालय के एक बंद कमरे से हुई थी, वह अब सुप्रीम कोर्ट के खुले न्यायिक मंच तक पहुंच चुका है। दबाव और तमाम परेशानियों के बावजूद दोनों पत्रकारों ने पीछे हटने के बजाय कानून और न्यायपालिका का रास्ता चुना। करीब 1 मई 2025 से 24 अगस्त 2026 तक की इस पूरी कानूनी यात्रा में कई ऐसे सवाल सामने आए हैं, जिनके जवाब अब न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से तलाशे जाने हैं। ग्वालियर हाईकोर्ट से मामला खारिज होने के बाद इस लड़ाई को उस समय और मजबूती मिली, जब देश के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दोनों पत्रकारों की कानूनी लड़ाई में साथ दिया और प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने भी पत्रकारों के समर्थन में आवाज बुलंद की। कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ और प्रतिष्ठित अधिवक्ता का साथ तथा प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का समर्थन इस मामले को स्थानीय दायरे से आगे ले जाकर पत्रकारिता की स्वतंत्रता और पत्रकारों के अधिकारों से जुड़े व्यापक सवालों के केंद्र में ला खड़ा करता है।
पत्रकारों ने इस संघर्ष को शायराना अंदाज में बयान करते हुए कहा, मैं तो अकेला चला था, लोग मिलते गए और कारवां बनता गया। आज यह पंक्ति इस पूरी लड़ाई पर सटीक बैठती दिखाई देती है। जिस समय यह संघर्ष शुरू हुआ, उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचेगा और वहां से राज्य सरकार तथा पुलिस अधिकारियों को जवाब देने के लिए नोटिस जारी होगा।
सवाल यह भी है कि जब कोई पत्रकार सत्ता, पुलिस या किसी प्रभावशाली व्यवस्था के सामने सच लिखता है, तो उसकी स्वतंत्रता, सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। ऐसे समय में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और उन तमाम पत्रकारों एवं अधिवक्ताओं का सहयोग इस संघर्ष को नई ताकत दी है। 17 महीने बीत चुके हैं, रास्ता अभी लंबा है और फैसला अभी बाकी है, लेकिन कलम आज भी जिंदा है। दबाव आया, मुश्किलें आईं, मानसिक तनाव आया, लेकिन पत्रकारिता का संकल्प नहीं टूटा। सच की इस लड़ाई में साथ खड़े होने वाले हर व्यक्ति और संस्था को सलाम। क्योंकि एक पत्रकार की लड़ाई जब न्याय की लड़ाई बन जाती है, तो उसकी आवाज अकेली नहीं रहती, वह कारवां बन जाती है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पत्रकारों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है।
टिकी निगाहें, आखिर उस बंद कमरे में क्या हुआ था
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कई गंभीर सवाल अब विचार के दायरे में हैं। आखिर उस बंद कमरे में क्या हुआ था? क्या मोबाइल फोन और सीसीटीवी से जुड़े कोई महत्वपूर्ण साक्ष्य मौजूद हैं? बाद में पत्रकारों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई किन परिस्थितियों में हुई? क्या पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच संभव है? इन सवालों का अंतिम उत्तर न्यायिक प्रक्रिया में सामने आना बाकी है।
करीब 17 महीने से चल रही इस लड़ाई में दोनों पत्रकारों को कानूनी प्रक्रिया के साथ मानसिक दबाव और विभिन्न परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपनी कलम को रुकने नहीं दिया। उन्होंने समझौते या दबाव के बजाय संवैधानिक और न्यायिक रास्ते को चुना। यही पत्रकारिता की असली ताकत है, व्यक्ति को दबाया जा सकता है, लेकिन सच के लिए उठी कलम को हमेशा के लिए खामोश नहीं किया जा सकता।
चाय पर बुलाने से शुरू हुआ विवाद
ज्ञात हो कि 1 मई 2025 को पत्रकारों को तत्कालीन भिंड पुलिस अधीक्षक असित यादव ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय में बुलाकर उनके साथ मारपीट की और इस दौरान एडिशनल एसपी संजीव पाठक, एसडीओपी दीपक तोमर, एसपी स्टेनो विपिन श्रीवास, थानेदार सत्येंद्र राजपूत, थानेदार बृजेंद्र सिंह सेंगर, थानेदार शिव प्रताप सिंह राजावत, थानेदार मुकेश शाक्य, एसआई सत्यवीर सिंह, एसआई देवेंद्र राठौर, एसआई गिरीश शर्मा, एसआई अतुल भदौरिया ने एक-एक कर पत्रकारों को चाय पर बुलाया और अंदर पहुंचने के बाद उनके मोबाइल छीन लिए। पुलिस अधिकारियों ने नाम पूछ-पूछकर चप्पल, लात-घूंसों से मारपीट की। यह कांड एसपी ने खुद खड़े होकर करवाया। जिन थानों के सामने से रेत के वाहन निकलते हैं, उन थाना प्रभारियों को बुलाकर पत्रकारों को नीचा दिखाने और बदनाम करने की नीयत से चप्पलों से पीटा गया, बेइज्जत किया गया। यह आरोप पत्रकारों ने लगाए थे।
घटना के तुरंत बाद संबंधित पत्रकारों ने अपने-अपने वीडियो जारी करते हुए बताया था कि उन्हें षड्यंत्र के साथ झूठे केसों में फंसाया जा सकता है और ठीक वैसा ही हुआ। घटना के बाद विवाद और गहरा गया। पत्रकारों के अनुसार, उनके खिलाफ अलग-अलग थानों में कई झूठे आपराधिक प्रकरण दर्ज किए गए।
राज्य से दिल्ली तक न्याय की तलाश
1 मई की कथित घटना के बाद पत्रकारों ने मध्यप्रदेश में पुलिस और प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर शिकायतें कीं। पुलिस महानिरीक्षक, उपमहानिरीक्षक, मुख्यमंत्री सहित वरिष्ठ अधिकारियों तक शिकायत की, लेकिन कहीं भी राहत नहीं मिली तो उन्होंने दिल्ली का रुख किया। जिसके बाद राजधानी में सभी पत्रकार एकजुट हुए। जिसके बाद पत्रकारों ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, प्रेस परिषद, मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग सहित विभिन्न मंचों पर अपनी शिकायतें दर्ज कराते हुए दोषी पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध जांच की मांग करते हुए न्याय की गुहार लगाई है।
हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची लड़ाई
दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की राहत के बाद मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ तक पहुंचा, जहां लंबे समय तक कानूनी लड़ाई चली। 29 अप्रैल 2026 को सुनवाई और उसके बाद 15 मई 2026 के आदेश के बाद पत्रकारों ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। और अब यही मामला सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका के रूप में विचाराधीन है।
24 अगस्त की सुनवाई ने बढ़ाई उम्मीद
जब ग्वालियर हाईकोर्ट से पत्रकारों को राहत नहीं मिली और याचिका खारिज कर दी गई तो, जिसके बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील ने फिर से लड़ाई शुरू की। माननीय सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट में शशिकांत गोयल और अमरकांत चौहान के नाम से याचिका दाखिल की, जो न्यायालय ने स्वीकार कर ली। 24 अगस्त 2026 को मामला न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ के समक्ष आया और कपिल सिब्बल साहब की बहस के बाद अदालत ने मप्र सरकार सहित एसपी असित यादव को नोटिस जारी करते हुए छह सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है। नोटिस जारी होते ही संबंधित पुलिस अधिकारियों और मप्र सरकार के पसीने छूट गए हैं। सर्वोच्च अदालत के सामने उन्हें पत्रकारों की ओर से लगाए गए आरोपों पर अपना पक्ष रखना होगा।
कपिल सिब्बल सहित कानूनी टीम ने संभाला मोर्चा
इस कानूनी संघर्ष में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और एडवोकेट अनुरुद्ध रामनाथन, अधिवक्ता तमन्ना पंकज और एडवोकेट बरीशा की भूमिका पत्रकारों के अनुसार महत्वपूर्ण रही। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में पैरवी किए जाने से पत्रकार अपनी कानूनी लड़ाई की बड़ी ताकत मानते हैं। लंबे संघर्ष के दौरान पत्रकारों ने सहयोग देने वाले अधिवक्ताओं, पत्रकार संगठनों और शुभचिंतकों के प्रति भी आभार व्यक्त किया है।
इनका कहना है:
“1 मई 2025 को पुलिस अधीक्षक कार्यालय में जिन अधिकारियों ने नाम और जाति पूछकर मेरी मारपीट की और गाली-गलौज किया है, उन पर कार्रवाई के लिए मैंने सभी मंचों पर शिकायत की है और अभी मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और मुझे विश्वास है कि इंसाफ जरूर मिलेगा।”
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शशिकांत गोयल, पत्रकार, भिंड
“मैं विगत 25 साल से भिंड जिले में पत्रकारिता कर रहा हूं। अपने साथ हुई घटना को लेकर मैं बहुत दुखी हूं मैं प्रेसक्लब ऑफ इंडिया, देश के सबसे बड़े वकील आदरणीय श्री कपिल सिब्बलजी ,बहन तमन्ना चतुर्वेदी जी एडवोकेट, अनिरुद्ध जी एडवोकेट ,विवेक सर, अध्यक्ष प्रेस इंडिया क्लब ऑफ़ इंडिया ,पूर्व अध्यक्ष श्री गौतम लहरी जी एवं हमारी समस्त प्रेस क्लब का में आभारी हूं कि वह मेरी लड़ाई लड़ रहे हैं न्याय की उम्मीद है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय हमें शीघ्र ही न्याय प्रदान करेगा
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अमरकांत चौहान, पत्रकार, भिंड*